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US-ईरान तनाव और महंगा क्रूड: शेयर बाजार में कोहराम, रुपये में रिकॉर्ड गिरावट


 मिडिल ईस्ट में बढ़ते तनाव ने इस बार होली के रंगों को फीका कर दिया। जहां देशभर में लोग रंगों और उत्साह के साथ त्योहार मना रहे थे, वहीं शेयर बाजार में निवेशकों के चेहरे पर मायूसी साफ नजर आई। बाजार खुलते ही भारी बिकवाली का दबाव देखने को मिला और कुछ ही घंटों में निवेशकों की संपत्ति से करीब 9 लाख करोड़ रुपये साफ हो गए। लगातार तीसरे कारोबारी दिन आई इस बड़ी गिरावट ने निवेशकों की चिंता और बढ़ा दी है।

होली के कारण 3 मार्च को बाजार बंद था, लेकिन 4 मार्च को जैसे ही कारोबार शुरू हुआ, माहौल नकारात्मक रहा। वैश्विक संकेत पहले से ही कमजोर थे और मिडिल ईस्ट में जारी संघर्ष ने बाजार की घबराहट को और बढ़ा दिया। बॉम्बे स्टॉक एक्सचेंज का प्रमुख सूचकांक सेंसेक्स सुबह खुलते ही तेज गिरावट के साथ कारोबार करने लगा। दिन के शुरुआती सत्र में यह लगभग 1,700 से 1,800 अंकों तक लुढ़क गया। इसी तरह नेशनल स्टॉक एक्सचेंज का निफ्टी भी 500 अंकों से अधिक की गिरावट के साथ निचले स्तरों पर पहुंच गया।

पिछले तीन कारोबारी दिनों की बात करें तो कुल मिलाकर निवेशकों को लगभग 20 लाख करोड़ रुपये से अधिक का नुकसान झेलना पड़ा है। यह गिरावट केवल घरेलू कारणों से नहीं, बल्कि वैश्विक अस्थिरता के कारण भी आई है। एशियाई बाजारों में भी तेज गिरावट दर्ज की गई। दक्षिण कोरिया का कोस्पी सूचकांक लगभग 8 प्रतिशत तक टूट गया, जबकि अमेरिकी बाजार भी दबाव में बंद हुए। वैश्विक बाजारों की यह कमजोरी भारतीय बाजार पर साफ दिखाई दी।

इस गिरावट के पीछे सबसे बड़ा कारण पश्चिम एशिया में बढ़ता भू-राजनीतिक तनाव माना जा रहा है। अमेरिका, ईरान और इज़राइल के बीच बढ़ती तनातनी ने वैश्विक निवेशकों की जोखिम लेने की क्षमता को कम कर दिया है। मिसाइल हमलों और जवाबी कार्रवाइयों की खबरों ने अनिश्चितता को और गहरा कर दिया है। निवेशक ऐसे माहौल में सुरक्षित विकल्पों की ओर रुख करते हैं और उभरते बाजारों से पूंजी निकालना शुरू कर देते हैं। इसका सीधा असर भारत जैसे बाजारों पर पड़ता है।

इसके साथ ही कच्चे तेल की कीमतों में आई तेज उछाल ने भी बाजार को झटका दिया है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में ब्रेंट क्रूड 82 डॉलर प्रति बैरल के पार पहुंच गया, जबकि डब्ल्यूटीआई क्रूड भी 75 डॉलर से ऊपर चला गया। तेल की कीमतों में तेजी का मतलब है कि भारत जैसे आयात-निर्भर देश पर महंगाई का दबाव बढ़ सकता है। पेट्रोलियम उत्पादों की लागत बढ़ने से कंपनियों के मुनाफे पर असर पड़ता है, जिससे शेयरों में बिकवाली बढ़ जाती है।

रुपये में आई कमजोरी भी चिंता का बड़ा कारण बनी हुई है। शुरुआती कारोबार में रुपया डॉलर के मुकाबले रिकॉर्ड निचले स्तर पर पहुंच गया। कमजोर मुद्रा का मतलब है कि आयात महंगा होगा और विदेशी निवेशकों का भरोसा डगमगा सकता है। जब विदेशी निवेशक भारतीय बाजार से पैसा निकालते हैं तो बिकवाली और तेज हो जाती है। फरवरी महीने में विदेशी संस्थागत निवेशकों ने लगातार बिकवाली की थी, और मार्च की शुरुआत में भी उन्होंने हजारों करोड़ रुपये के शेयर बेचे। इससे बाजार पर दबाव और बढ़ गया।

बाजार में गिरावट का सीधा असर निवेशकों की संपत्ति पर पड़ा। बीएसई का कुल मार्केट कैप कुछ ही घंटों में करीब 9 लाख करोड़ रुपये घट गया। मार्केट कैप में कमी का मतलब है कि कंपनियों का कुल बाजार मूल्य कम हो गया है। यही आंकड़ा निवेशकों के नुकसान को दर्शाता है। जिन लोगों ने हाल ही में बाजार में निवेश किया था, उन्हें सबसे ज्यादा झटका लगा है। हालांकि, लंबी अवधि के निवेशकों के लिए ऐसे उतार-चढ़ाव को सामान्य माना जाता है, लेकिन अल्पकालिक निवेशकों के लिए यह स्थिति काफी चुनौतीपूर्ण होती है।

विशेषज्ञों का मानना है कि जब तक मिडिल ईस्ट में तनाव कम होने के संकेत नहीं मिलते, तब तक बाजार में अस्थिरता बनी रह सकती है। कच्चे तेल की कीमतें, डॉलर इंडेक्स और विदेशी निवेशकों की गतिविधियां आने वाले दिनों में बाजार की दिशा तय करेंगी। यदि युद्ध जैसी स्थिति लंबी खिंचती है, तो वैश्विक अर्थव्यवस्था पर भी इसका असर पड़ सकता है, जिससे शेयर बाजारों में और उतार-चढ़ाव देखने को मिल सकता है।

हालांकि, कुछ विश्लेषक यह भी कहते हैं कि हर बड़ी गिरावट अपने साथ अवसर भी लेकर आती है। मजबूत कंपनियों के शेयर सस्ते दामों पर मिल सकते हैं, जिससे दीर्घकालिक निवेशकों को फायदा हो सकता है। लेकिन इसके लिए धैर्य और सही रणनीति जरूरी है। बिना सोचे-समझे घबराहट में की गई बिक्री से नुकसान और बढ़ सकता है।

इस पूरे घटनाक्रम ने एक बार फिर साबित किया है कि भारतीय शेयर बाजार वैश्विक घटनाओं से अछूता नहीं है। मिडिल ईस्ट में चल रही जंग, कच्चे तेल की कीमतों में उछाल, डॉलर की मजबूती और विदेशी निवेशकों की बिकवाली—इन सभी कारकों ने मिलकर बाजार को झकझोर दिया है। होली जैसे रंगों के त्योहार के बीच आई इस गिरावट ने निवेशकों के उत्साह पर पानी फेर दिया है।

फिलहाल निवेशकों के लिए सबसे अहम है सतर्क रहना, जल्दबाजी में फैसले न लेना और बाजार की दिशा को समझते हुए कदम उठाना। आने वाले दिनों में यदि वैश्विक हालात सुधरते हैं और कच्चे तेल की कीमतें स्थिर होती हैं, तो बाजार में रिकवरी की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता। लेकिन तब तक अस्थिरता और उतार-चढ़ाव के लिए तैयार रहना ही समझदारी होगी।

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