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संपादकीय : इश्क का खंजर - मोहब्बत, मृत्यु और एक मंजर

 


हम तुम आज जन्नत में रहते हैं,,

 यहां कोई शिकवा, शिकायत

  नहीं है,,किसी को किसी से,,..

 लेकिन मेरे कुछ प्रश्न है तुमसे

         मै,, न जाने कब से,,

 मृत्यु लोक से पूछती आ रही हूं,,

          तुमसे कुछ प्रश्न

 परंतु मुझे मेरे प्रश्नों के उत्तर,,

 अब तक नहीं मिले तुमसे,,

        जन्नत में आज ये,,

 उम्मीद करती हूं मैं तुमसे,,

 मुझे मेरे सारे प्रश्नों के उत्तर,,

      मिल जाएंगे आज

        तुम्हारे दिल से,,

तो,, रब कि इजाजत हो अगर,

      कुछ प्रश्न करना चाहूंगी,,

      मै,, आज यहां जन्नत में,,

            अपनी मोहब्बत से,,

 मोहब्बत में मेरा कत्ल क्यों किया तुमने,,

  मैं,,तो तुमसे बेपनाह, बेहद,

 बिना शर्त के मोहब्बत आज भी करती हूं,,

           फिर मेरे दिल को,,

      बेवजह, अपने नाम के,,

    खंजर से,, लहू -लुहान

         क्यों किया तुमने,,

    मेरी जान तो पहले से,,

      तुम्हारे पास ही थी,,

       फिर जमाने में,

 अपनी मोहब्बत का कातिल,,

 ये,, कलंक अपने सर पर,,

      क्यों लिया तुमने ? 

 तुम चुपचाप क्यों खड़े हो

 कुछ जवाब तो, दो,,

 अगर तुम बेगुनाह हो,,

 अपनी बेगुनाही का,,

 कोई साक्ष्य,कोई प्रमाण

         तो,दो,,.....

 हां, हा मै,, कातिल हूं तुम्हारा,,

    मैंने ही अपने हाथों से,,

  अपनी मोहब्बत को था मारा,,

  लेकिन सच यह भी है,,

   वही तुम्हारे लहू में 

   डूबा हुआ खंजर

  मैंने अपने दिल में भी,,

    था उतारा,,

 तुम्हारे लहू से,,

 मैंने अपनी सांसों का भी,,

    अंत किया था....

 यकीन करो मेरा तुम

 क्योंकि मैं भी तुमसे,,

 बेपनाह प्यार किया था....

 क्योंकि जिस जमाने में 

हमने प्यार किया था....

 अपनी मोहब्बत का 

इजहार किया था

 वो, मोहब्बत के 

लायक है ही नहीं,,....

 सुन रहा है ना तू,

रब, तेरी बनाई हुई दुनिया,

   एक षडयंत्रों की,,

     पाठशाला है

रब तूने अपनी दुनिया में,

 जहर भर भर के डाला है,,

   इस दुनिया को,,

 हमारी मोहब्बत मंजूर नहीं थी,,

 सत्य सुन सकती हो तो सुनो,

तुम,, तुम्हें पागल घोषित करके,,

 तुम्हारा प्यार मेरे दिल से,,

 निकलने की साजिश,,

 हमारे अपनों ने रची थी,,

 मेरे दिल को,,

 तुमसे अलग होना मंजूर नहीं था,

 एक मोहब्बत करने के सिवा,,

 हमारे दिल का कोई कसर नहीं था,,

          मेरे दिल को

 यह समझ में आ गया था

कि अब हम इस नफरत

 से भरी दुनिया में,,

 एक साथ और सांसे,

     नहीं ले पाएंगे...

 अगर मेरे दिल की मोहब्बत ने,,

    कुछ नहीं किया अभी,,

     तो ,, हमारे दिल

      हमेशा हमेशा के लिए,,

         एक- दूसरे से,,

         अलग हो,, जाएगे 

          तभी मेरे दिल ने,,

       रब की दुनिया को,,

      तुम्हारे साथ छोड़ने का,,

            फैसला किया,,

          और मेरे हाथों ने,,

          रब की मर्जी के,,

           खिलाफ जाकर,,

        हमारी मोहब्बत के लिए,,

         मैंने अपने और तुम्हारे लिए,,

             मृत्यु को,, चुन लिया,,

             मैंने जो कहना था

        कह दिया, बस,कह दिया....

               मैंने जो, किया

          जन्नत में तुम्हारे साथ

              रहने को किया.....

              रब की जालिम,,

                  दुनिया ने तो,,

                 हमें एक साथ,,

                 रहने न दिया 

              मुझे मेरा गुनाह कबूल है

          तुम्हारी दी हुई, हर सजा,,

               मुझे कबूल है,,

            मगर मेरे दिल के हिसाब से,,

              असली गुनहगार,, तो,,

               इस रब का उसूल है.......

      कितना अत्याचार हुआ है तुम्हारे दिल पर,,

                    जाओ मैंने भी तुम्हें,,

           अपने कत्ल के इल्जाम से,,

                     मुक्त किया, और हा

           तुम्हारी मोहब्बत भी मुझे कबूल है

           पर एक शिकायत मुझे अभी भी है,,

                  तुम्हारी दिल से,,

     तुमने मुझे क्यों नहीं बताए, अपने दिल के जज्बात

                  अपने दिल के हालत,,

         ये,, तुम्हारी मोहब्बत कोई एक तरफा थोड़ी है

                तुम्हारा भी दिल है मेरे पास,, इश्क में

             मोहब्बत में बलिदान देने का हक,,

               एक अकेले तुम्हारे पास थोड़ी है,,

                 चलो कोई बात नहीं,,

            मैंने तुम्हें इस जीवन के,,

            हर, गुनाह हर गलती से,,

                माफ किया

             ये, जीवन तो,,चला गया

       

पर तुम एक वादा करो मुझसे,,

                 अगले जन्म, जन्मों में,,

  जब हमारी कहानी के, किरदार लिखे जाएगे,,

      तो तुम्हारी कहानी के सारे दर्द मेरे भाग्य में,

                     लिखे जाएंगे,,

               तुम मुझे कोई बात

           नहीं भी बता पाऊं तो,,

             तुम्हारे ख्याल हा, तुम्हारे

             तुम्हारी आंखों से नजर आएंगे,,


कवि आकाश शर्मा आज़ाद

आगरा उप्र

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