मोहम्मद काशिफ NTI TV सुल्तानपुर। शहर की जनता आजकल एक नए सवाल से जूझ रही है— क्या जाम की समस्या नई है, या विधायक जी की नींद अब टूटी है?
लगातार तीन वर्षों तक सुल्तानपुर की सड़कों पर रेंगते वाहन, एंबुलेंस में फंसे मरीज और स्कूल जाते बच्चों की देर से पहुंच—यह सब किसी से छिपा नहीं रहा। लेकिन हैरानी की बात यह है कि अब जाकर शहर विधायक विनोद सिंह को जाम की समस्या जन संकट नजर आई है।
प्रेस वार्ता में विधायक जी ने जाम को लेकर बड़े-बड़े एलान किए—
10 हजार विद्यार्थियों के साथ सड़क पर उतरने की चेतावनी,
जन आंदोलन की बात,
और अतिक्रमण हटाओ अभियान।
सवाल सीधा है—
क्या जाम पिछले तीन महीने से लगा है या तीन साल से?
पालिका भी भाजपा की, विधायक भी भाजपा के—तो दोष किसका?
सबसे दिलचस्प पहलू यह है कि जिस नगर पालिका पर अतिक्रमण हटाने और यातायात सुधार की जिम्मेदारी है, उसके चेयरमैन भी भारतीय जनता पार्टी से ही हैं—प्रवीण अग्रवाल।
लेकिन न तो अब तक चेयरमैन ने जाम पर कोई ठोस पहल की,
और न ही विधायक जी ने कभी सार्वजनिक मंच से उनसे जवाबदेही तय की।
अब अचानक सारा दोष प्रशासन पर डालकर आंदोलन की बात करना, जनता को थोड़ा अटपटा लग रहा है।
जहां अतिक्रमण सबसे ज्यादा, आवाज भी वहीं से सबसे तेज
शहर का सच यह है कि
सबसे ज्यादा भीड़ वाले इलाके—चौक, चौराहे और मुख्य बाजार—वहीं सबसे ज्यादा अतिक्रमण है।
दुकानें सड़क तक फैली हैं,
ठेले बीच सड़क खड़े हैं,
और पार्किंग भी सड़क पर ही हो रही है।
और मजेदार बात यह है कि
जाम के खिलाफ सबसे ज्यादा आवाज भी वहीं से उठ रही है।
आवाज उठनी भी चाहिए—
लेकिन ईमानदारी के साथ।
अगर अतिक्रमण हटाना है, तो
केवल गरीब ठेला वालों पर ही कार्रवाई क्यों?
क्यों न बड़े दुकानदारों, रसूखदारों और स्थायी कब्जों पर भी बुलडोजर चले?
नगर पालिका और प्रशासन की सफाई मुहिम चुनिंदा नहीं, समान होनी चाहिए।
*नारे कहीं, समस्या कहीं*
सुल्तानपुर की राजनीति का यह दौर भी अजीब है—
कहीं कुछ लोग खुद को चमकाने के लिए लापता सांसद के सोशल मीडिया पोस्ट पर नारे लगा रहे हैं,
तो कहीं भारतीय जनता पार्टी के विधायक जाम हटाने के नाम पर 10 हजार विद्यार्थियों के साथ सड़क पर उतरने की चेतावनी दे रहे हैं।
जनता हैरान है कि—
शहर की समस्या जाम है या नेताओं की सक्रियता साबित करने की होड़?
न सांसद की जमीनी मौजूदगी पर सवालों का जवाब है,
न जाम के स्थायी समाधान की ठोस कार्ययोजना।
*जागना अच्छी बात है, लेकिन देर से जागना सवाल खड़े करता है*
यह सच है कि सुल्तानपुर को जाम से मुक्ति चाहिए।
यह भी सच है कि अतिक्रमण हटना चाहिए।
लेकिन जनता यह भी पूछ रही है—
क्या यह जागरूकता चुनावी मौसम की देन है?
क्या जन आंदोलन की धमकी प्रशासन पर दबाव है या राजनीतिक मजबूरी?
और क्या जिनके कारण जाम है, वही अब खुद को सबसे बड़ा पीड़ित बता रहे हैं?
सुल्तानपुर को जाम मुक्त बनाने के लिए न नारों की जरूरत है,
न ही देर से जागे आंदोलनों की।
जरूरत है— ईमानदार कार्रवाई की। बिना भेदभाव अतिक्रमण हटाने की। और सत्ता पक्ष के भीतर जवाबदेही तय करने की
क्योंकि जाम सड़क पर नहीं, सिस्टम में लगा है।
और जब तक वह नहीं हटेगा,
हर प्रेस वार्ता केवल एक और जाम पैदा करती रहेगी—
जनता के भरोसे का।
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